अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत

 

अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत पंजीकृत संगठन के रूप में 1974 में सामने आई। परंतु ग्राहक आंदोलन का कार्य स्वयंसेवकों द्वारा इसके कई वर्ष पूर्व से किया जा रहा था । विदर्भ में माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ीजी से प्रेरणा लेकर तरुण भारत पत्र में मजदूर क्षेत्र सँभालने वाले राजाभाऊजी पोफब्डी तथा पुणेके बिंदुमाधव जोशी जी, दोनों ही इस काम में लगे थे, मजे कीबात यह है कि दोनों कार्यकर्ता एक दूसरे के संपर्क में नहीं थे । पुणे में बिंदुमाधव जोशी ग्राहक शक्ति को संगठित कर सहकार आंदोलन की सहायता से उसे उचित मूल्य पर वस्तु उपलब्ध करवाने के लिए प्रयासरत थे, तो विदर्भ में राजाभाऊ पोफव्ठीविभिन्नि ग्राहक संघों के माध्यम से ग्राहक शक्ति को संगठित कर संबंधित विभागों में ग्राहक शक्ति के माध्यम से ग्राहकों की समस्याओं का निराकरण करने में लगे हुए थे ।

1975 आते आते नागपुर में बैंक बीमा आदि अनेक विषयों पर कार्य प्रारंभ हो गया या । उसी दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक प. पू, बाव्ठासाहब देवरस जी ने एक दिन राजाभाऊ पोफब्डी से पूछा कि वह किस काम में लगे हुए हैं? पू, बाव्ठासाहब ने राजाभाऊ को बताया कि पुणे मेंबिंदुमाधव जी भी इसी तरह के कार्य में लगे हैं उन्होंने राजाभाऊ से बिंदुमाधव जोशी से संपर्क करने को भी कहा | राजाभाऊ ने पुणे में चलने वाले कार्यो की जानकारी प्राप्त करना प्रारंभ किया तो पता चला कि बिंदुमाधव जी ने सितंबर 1974 में वहां ग्राहक पंचायत नाम से संगठन का पंजीकरण कराया है संगठन का उद्घाटन 23 फरवरी 1975 को न्यायमूर्ति मोहम्मद करीम छागला द्वारा किया गया। बाद में वहां ल लक्ष्मी रोड पर दुकानदारों के खिलाफ सामान को अत्यधिक महंगे दामों पर बेचने के विरोध में प्रदर्शन किया गया | सहकारी भंडार खोलकर ग्राहकों को उचित मूल्य पर वस्तुएं उपलब्ध करवाने की योजना भीबनाई गयी । केंद्र सरकार की सहकारी ग्राहक भंडार योजना पर आधारित एक भंडार भी खोला गया ।

नागपुर ग्राहक आंदोलन व्यापारियों को अपने से अलग न मानते हुए उनसे उचित व्यवहार करने के आग्रह पर आधारित था । जब नागपुर के कार्यकर्ताओं को पुणे में होने वाले कार्य के स्वरूप की जानकारी मिली तो उन्होंने उस के संबंध में विचार किया । उनका मत था कि इस कार्य से मध्यमवर्गीय ग्राहकों को थोड़ा लाभ मिलेगा परंतु इससे व्यापारियों व ग्राहक को अलग- अलग समुदाय मानने की धारणा भी विकसित होगी, जिससे आगे चलकर इन समुदायों में संघर्ष की संभावना भी बढ़ेगी |

अत: नागपुर के कार्यकर्ताओं ने तय किया कि जिसका जो कार्य है, वह वही करें, सिर्फ उचित व्यापार पद्धति अपनाने पर जोर दिया जाए । प. पू, बाव्ठासाहब जी की इच्छा के अनुसार बिंदुमाधव जोशी नागपुर का कार्य देखने आए । यहां के कार्यकर्ताओं से उनकी चर्चा भी हुई बाद में नागपुर के कार्यकर्ताओं ने कंज्यूमर फोरम के कार्य को पूरे विदर्भ में फैलाने का निर्णय लिया। मा. बापू महाशब्दे व राजाभाऊ को विदर्भ के प्रांत प्रचारक श्री वसंतराव कस्बेकर का बहुत सहयोग मिला । कार्यकर्ताओं की खोज शुरू हुई। बुलढाणा में अशोक खेकाले, भंडारा में शरद देशपांडे, अमरावती में खापर्डे, यवतमाल में गोविंद शेवडे, अकोला में अन्ना साहब देशपांडे व गोंदिया में आकांत आदि कार्यकर्ताओं से संपर्क किया गया । नागपुर में भी 40 भागों में कार्य चलने लगा था। 15 से 20 कार्यकर्ताओं का गट तो बाजार से अपने नित्य उपयोग का सामान खरीद कर उसका वितरण किया करते थे। कार्यकर्ता सामान खरीदने की सूची बनाते तथा सामान का वितरण करते समय एकत्र आते ये । क्षेत्र की ग्राहक समस्याओं पर भी इन बैठकों में चर्चा होती तथा समस्याओं के निराकरण के मार्ग निकाले जाते थे ।

सन्‌ 1976 में बिंदुमाधव जी फिर नागपुर आए, कार्यकर्ताओं के साथ उनकी बैठक हुई । उन्होंने कंज्यूमर फोरम तथा ग्राहक पंचायत के विलय का प्रस्ताव कार्यकर्ताओं के सामने रखा। चर्चा के बाद कार्यकर्ताओं ने विलय संबंधी निर्णय लेने की जिम्मेदारी बापू महाशब्दे तथा राजाभाऊ पर छोड़ दी । कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझते हुए बापू महाशब्दे तथा राजाभाऊ ने विचार किया कि फिलहाल विलय जैसी बात से बचा जाए। कार्य करते करते अपने आप वातावरणबन जाएगा। अत: कार्य कभी कंजूमर फोरम तो कभी ग्राहक पंचायत के बैनर तले किया जाने लगा।

सन्‌ 1978 में नागपुर कंज्यूमर फोरम द्वारा एक बैठक बुलाई गई जिसमें माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ीजी ने कार्य विस्तार की दृष्टि से कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया | इस बैठक में बापू महाशब्दे राजाभाऊ पोफव्डी, मू. व. मिसीकर, मधुकरराव पात्रे, कुमार भागवत, गंगाधर राव ढोबले तथा बिंदुमाधव जोशी उपस्थित थे | 1978 में ही गुरु पूर्णिमा के दिन से सप्ताह में दो बार चार पृष्ठ के उपभोक्ता पत्र" का प्रकाशन प्रारंभ किया गया । उपभोक्ता पत्र का प्रकाशन 1996 तक चला |

सन्‌ 1979 में श्री गोविंद दास मूंदड़ा की अध्यक्षता में ग्राहक पंचायत की कानून समिति बनी जिसमें बापू महाशब्दे, बिंदुमाधव जोशी, राजाभाऊ पोफब्डी, स्वाति शहाणे, शरद शहाणे शंकरराव पाध्ये, पी. सी. बढिये और गोविंदराव आठवले ये | सुरेश बहिराट इस समिति के संयोजक थे | 27 सितंबर 1980 को ग्राहक कानून के बिल को अंतिम रुप दिया गया । ग्राहक कानून के प्रारूप को समाचार पत्रों में प्रकाशित करने के साथ-साथ मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के न्यायाधीश एन एस अभ्यंकर, मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रंगोले, महाराष्ट्र के सचिव श्याम खराबै तथा देशभर में अनेकों विद्वानों को मार्गदर्शन के लिए भेजा गया | संसदीय मार्ग विषय पर मार्गदर्शन के लिए महाराष्ट्र विधान परिषद के अध्यक्ष ए. यू. गवई को बुलाया गया। उन्होंने इसे निजी बिल के रूप में रखवाने का सुझाव दिया। सांसदों के माध्यम से यह प्रयास किया गया । जनसंघ के श्री रामभाऊ म्हालगी तैयार हो गए। उन्होंने विधेयक का प्रारूप संसद में रखने योग्य बना कर राजाभाऊ को एक अन्य सांसद के हस्ताक्षर लाने को कहा | प्रयत्न चल रहा था कि तभी मुस्लिम लीग के सांसद श्री जी. एम. बनातवाला नागपुर आए । राजाभाऊ ने उनसे संपर्क किया व उनका अनुमोदन बिल के लिए प्राप्त कर किया । बिल संसद में रखा गया परंतु रामभाऊ म्हालगी के आकस्मिक निधन के कारण चर्चा में न आ सका । बाद में श्री राजीव गांधी के राजनीति में प्रवेश के समय नागपुर आगमन पर उनसे संपर्क किया गया, उन्होंने सहमति दर्शाई व ग्राहक संरक्षण अधिनियम संसद से पारित करवा दिया |

नवंबर 1983 को चंद्रपुर में सम्मेलन बुलाया गया तब तक पश्चिम महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे व डोंबिवली में सहकारी भंडार चलते थे | सन्‌ 1984 अप्रैल में नागपुर भारतीय मजदूर संघ के कार्यालय में सम्मेलन बुलाया गया। जिसमें विदर्भ, पश्चिम महाराष्ट्र के साथ-साथ बिहार, गुजरात, आंध्र, तमिलनाडु, जयपुर तथा गोरखपुर के कार्यकर्ता आए । इस समय तक विदर्भ कंज्यूमर फोरम तथा ग्राहक पंचायत दोनों नामों से कार्य चल रहा था बैठक में दोनों संगठनों का विलय कर अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत'' नाम अपनाया गया।

माननीय दत्तोपंत ठेंगड़ीजी को जुलाई 1984 में पुणे में आयोजित बैठक में बुलाया गया । उन्होंने ग्राहक पंचायत के वैचारिक दृष्टिकोण को स्पष्टता से समझाया | उनका कहना था कि व्यापारी व ग्राहक की भूमिका में व्यक्ति का यह संघर्ष है। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत को इतने वर्षों में संगठनात्मक स्तर पर अपेक्षित सफलता तो उतनी नहीं मिली परंतु उसने ग्राहक आंदोलन के क्षेत्र में चार बड़े कार्य किए हैं, जिसका ग्राहक आंदोलन में वैश्विक स्तर पर योगदान हैं |

 (1) ग्राहक आंदोलन की दृष्टि व दिशा

विश्व का ग्राहक आंदोलन इसे बाजार में वस्तुओं की खरीदी बिक्री से संबंधित मानकर चल रहा था | अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने ग्राहक शब्द की व्याख्या की। ग्राहक अर्थचक्र का वह महत्वपूर्ण घटक है जिसकी अनुपस्थिति में कोई भी आर्थिक गतिविधि पूरी नहीं हो सकती । ग्राहक को भी तब तक आर्थिक न्याय नहीं मिल सकता, जब तक अर्थरचना में उसके महत्व को जाना व माना न जाए । महत्व के अनुरूप ही उसे अर्थरचना में भागीदारी मिले | ग्राहक पंचायत ने ग्राहक आंदोलन को संपूर्ण आर्थिक आंदोलन का स्वरूप दे दिया, जिसमें ग्राहक को धनार्जन में उचित व उपयुक्त अवसर मिलने के साथ ही, उसके अर्जित धन की बाजार में अन्य स्थानों पर सुरक्षा हो ।

ग्राहक पंचायत की भूमिका ने ग्राहक आंदोलन के महत्व को कहीं अधिक बढ़ा दिया है । ग्राहक आंदोलन वर्तमान आर्थिक जगत्‌ के लिए संपूर्ण क्रांति का संदेश लेकर आगे बढ़ रहा है।

(2) ग्राहक संरक्षण अधिनियम

 

 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 को संसद में पारित कराना तथा इस कानून के अनुसार ग्राहकों को न्याय दिलवाने हेतु विधिवत उपभोक्ताे फोरम की रचना व गठन कराना । ग्राहक संरक्षण अधिनियम बनवाने में अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की भूमिका ऊपर बताई जा चुकी है।

 (3) ग्राहक संरक्षण अधिनियम व संशोधन

अधिनियम आने के बाद जब ग्राहक संरक्षण से जुड़ी न्याय व्यवस्था का अध्ययन ग्राहक पंचायत ने किया तो उसे लगा कि ग्राहक कानून भी अन्य कानूनों की तरह न्यायायलीन गतिविधियों का शिकार बनता जा रहा है। ग्राहक न्याय पाने के उद्देश्य से ग्राहक मंच जाता तो है, परंतु व्यवस्था का पूर्ण स्वरूप न्यायालय के समकक्ष हो जाने से वह न्याय के अभाव में भटकता रहता है । व्यवस्था की इन कमियों का अध्ययन करने के बाद अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजाभाऊ पोफब्ी द्वारा ग्राहक कल्याण और शासन'' नाम की पुस्तक लिखी गई । इस पुस्तक में ग्राहक कानून में संशोधन के साथ-साथ ग्राहक आंदोलन की शासन से अपेक्षाओं की व्याख्या की गई है।

ग्राहक संरक्षण अधिनियम नवीन संशोधन विधेयक संसद में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 पारित हो चुका है । इस संशोधन विधेयक से वर्तमान ग्राहक कानून का पूरा स्वरुप ही बदल गया है।

 (4) भारतीय ग्राहक की देन

किसी भी देश व समाज के लिए वह दिन महत्वपूर्ण होता है, जिस दिन देश या समाज से संबंधित कोई विशेष घटना घटित होती है या इस संबंध में किया गया कोई प्रयास सफल होता है। विश्व में परंपरा है कि 45 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय ग्राहक दिवस मनाया जाता है | यह इसलिए कि अमेरिकी संसद में राष्ट्रपति कैनेडी ने उस दिन ग्राहक अधिकारों के संबंध में बातें कही थी । अमेरिका की दृष्टि से यह निश्चित ही महत्वपूर्ण व अभिमान करने लायक घटना है । परंतु भारत में इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता |

अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत द्वारा सन्‌ 1999 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था । इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि तत्कालीन खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति तथा ग्राहक मंत्री श्री शांताकुमार थे । सम्मेलन में शांताकुमार जी ने अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के आग्रह पर 24 दिसंबर भारतीय ग्राहक दिन की घोषणा की। 24 दिसंबर इसलिए क्योंकि इसी दिन भारत के राष्ट्रपति ने संसद द्वारा पारित ग्राहक संरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर कर उसे अधिनियम का स्वरूप दिया था |

संगठन की प्रमुख उपलब्धियाँ

वर्तमान में ग्राहक पंचायत देश के विभिन्नर प्रांतों में ग्राहकों को जागरूक बनाने वह उन्हें न्याय दिलाने की गतिविधियां कर रही है गतिविधियों में कुछ मुख्य इस प्रकार से हैं |

मुनाफाखोरी पर लगाम

अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत द्वारा देश के अनेकों शहरों में व्यवसायियो द्वारा ग्राहकों की लूट पर रोक लगाई है । पुणे में ग्राहक पंचायत के कार्यकर्ताओं द्वारा बिल्डरों की मनमानी के विरोध में ग्राहकों को समय सीमा के अंदर फ्लैट दिलाने के साथ बिल्डरों द्वारा प्रस्तावित सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने के अनेकों कार्य किए हैं | कई बिल्डरों के जाल में फंसे ग्राहकों को उनके द्वारा जमा कराई गई धनराशि ब्याज सहित वापस करवाई गई है । ग्राहक पंचायत के सतत प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भूसम्पदा विनियामक प्राधिकरण कानून आ चुका है।

 

मुनाफाखोरी रुकवार्ई

1- डुंदौर क्रिकेट मैच खानपान सामग्री की बिक्री में. 62.5 लाख रु.

2- 36 सुपरफास्ट ट्रेनों के सुपर चार्ज रद करवाकर 80 लाख रु प्रति माह.

3- रेल केटरिंग की रेटलिस्ट प्रकाशित करवाकर 25 करोड़ रु.प्रतिदिन

4- ट्रेनों में वापसी टिकिट का चार्ज हटवाकë